जगजीत सिंह द्वारा गाई एक ग़ज़ल सुन रहा था , सोचा SHARE करते है .
चराग़-ओ-आफताब गुम, बड़ी हसींन रात थी .
श़बाब की नक़ाब गुम, बड़ी हसींन रात थी .
मुझे पिला रहे थे वो की खुद ही शम्मा बुझ गयी
गिलास गुम, शराब गुम , बड़ी हसींन रात थी .
लिखा था जिस किताब में कि इश्क तो हराम है.
हुयी वोही किताब गुम , बड़ी हसींन रात थी .
लबो से लब जो मिल गए , लबो से लब ही सिल गए .
सवाल गुम , जबाब गुम , बड़ी हसींन रात थी .
शायर - सुदर्शन फ़ाकिर
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Monday, May 3, 2010
Sunday, April 6, 2008
बागीचा-ए-अत्फाल है दुनिया मेरे आगे - मिर्ज़ा ग़ालिब
शायर - मिर्ज़ा ग़ालिब
बागीचा-ए-अत्फाल है दुनिया मेरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे
होता है निहां गर्द में सेहरा मेरे होते
घिसता है जबीं ख़ाक पे दरिया मेरे आगे
मत पूछ के क्या हाल है मेरा तेरे पीछे ?
तू देख के क्या रंग है तेरा मेरे आगे
फिर देखिये अंदाज़-ए-गुल अफ्शानी-ए-गुफ्तार
रख दे कोइ पैमाना-ओ-सहबा मेरे आगे
इमां मुझे रोके है जो खींचे है मुझे कुफ्र
काबा मेरे पीछे है कलीसा मेरे आगे
गो हाँथ को जुम्बिश नहीं आंखों में तो दम है
रहने दो अभी सागर-ओ-मीना मेरे आगे
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